छत्तीसगढ़

क्या किसान की पुश्तैनी जमीन पर बना रायपुर का स्वामी विवेकानंद  एयरपोर्ट?

दावा- ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लीज पर ली थी जमीन, लौटाने का वादा नहीं निभाया; 35 साल की कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर

रायपुर।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह कोई विमान सेवा या विकास परियोजना नहीं, बल्कि करीब 84 साल पुराने जमीन विवाद का मामला है। रायपुर के किसान अश्विनी बांधे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर एयरपोर्ट परिसर की लगभग 34.35 हेक्टेयर जमीन पर अपने पुश्तैनी अधिकार का दावा किया है। साथ ही उन्होंने करीब 3500 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है।

किसान का कहना है कि जिस भूमि पर आज एयरपोर्ट टर्मिनल और अन्य महत्वपूर्ण ढांचे मौजूद हैं, वह कभी उनके पूर्वजों की थी। उनका आरोप है कि ब्रिटिश शासन ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस जमीन को स्थायी रूप से अधिग्रहित नहीं, बल्कि अस्थायी लीज पर लिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद जमीन वापस करने का वादा किया गया था, लेकिन न तो जमीन लौटाई गई और न ही तय शर्तों का पालन किया गया।

35 साल से न्याय की लड़ाई

अश्विनी बांधे का दावा है कि वे पिछले करीब 35 वर्षों से इस मामले में सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। इस लंबी कानूनी लड़ाई में अब तक करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। उनका कहना है कि हाल ही में संस्कृति विभाग की एक प्रदर्शनी से उन्हें अधिग्रहण से जुड़े महत्वपूर्ण राजस्व रिकॉर्ड मिले, जिनकी प्रमाणित प्रतियां अब सुप्रीम कोर्ट में साक्ष्य के रूप में पेश की गई हैं।

1942 में बना था माना एयरफील्ड

याचिका में पेश दस्तावेजों के अनुसार, 1942 में ब्रिटिश सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत युद्धकालीन जरूरतों के लिए माना एयरफील्ड का निर्माण कराया था। इसके लिए बरौदा, रामचंडी और आसपास के गांवों की जमीन ली गई थी। किसान का दावा है कि उस समय उनके पूर्वजों को सिर्फ 1300 रुपये वार्षिक लीज पर जमीन देने के लिए राजी किया गया था और युद्ध समाप्त होने के बाद भूमि वापस करने का आश्वासन भी दिया गया था।

पुराने दस्तावेज बने सबसे बड़ा आधार

किसान का कहना है कि हाल में मिले राजस्व दस्तावेज इस पूरे मामले में सबसे अहम सबूत हैं। उनके अनुसार, इन रिकॉर्ड में जमीन के अधिग्रहण और लीज की शर्तों का उल्लेख है, जो उनके दावे को मजबूत करते हैं। यही दस्तावेज अब सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका का मुख्य आधार बने हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी सबकी नजर

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि अदालत किसान के दावों को स्वीकार करती है, तो यह छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े और चर्चित भूमि विवादों में शामिल हो सकता है। वहीं, सरकार और संबंधित एजेंसियों का पक्ष भी इस मामले की दिशा तय करने में अहम रहेगा।

नोट: फिलहाल यह किसान द्वारा सुप्रीम कोर्ट में किया गया दावा है। मामले पर अंतिम निर्णय न्यायालय की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।

Buland Chhattisgarh

Show More

Related Articles

Back to top button

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker