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विवादित अधिकारी बना प्रमुख अभियंता — सिस्टम पर गंभीर सवाल

2015 की चेतावनी बेअसर, 2026 में इनाम?

रायपुर/नवा रायपुर
छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। 2015 की जांच रिपोर्ट में जिन अनियमितताओं और लापरवाही का खुलासा हुआ था, उसी परियोजना से जुड़े अधिकारी को 2026 में प्रमुख अभियंता (ENC) जैसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा दिया गया। इस फैसले ने सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही मंत्रालय की भूमिका पर भी संदेह जताया जा रहा है कि कहीं यह कदम मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने की सोची-समझी चाल तो नहीं।

शंकर ठाकुर पर मेहरबानी या सिस्टम की बड़ी साजिश?


2015 की रिपोर्ट: लापरवाही की पूरी कहानी


कार्यालय अधीक्षण अभियंता, हसदेव परियोजना, जगदलपुर की जांच रिपोर्ट में कोंडागांव जिले में बने एनीकट-कम-कारजवे निर्माण में भारी अनियमितताएं उजागर हुई थीं—
₹463.53 लाख की लागत से बने निर्माण में गंभीर तकनीकी खामियां
एनीकट के नीचे 7–8 मीटर तक गहरी खुदाई
ऊपर से लगातार भारी वाहनों की आवाजाही
सुरक्षा उपायों की पूरी तरह अनदेखी
नतीजा: 100 मीटर लंबाई में संरचना ध्वस्त, बीच का हिस्सा 1 मीटर से अधिक धंसा
निर्माण के दौरान ही एनीकट के ऊपर से पानी बहना शुरू
रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि यह सीधी लापरवाही है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

जांच फ़ाइलों में दबी, इनाम में मिली कुर्सी:


रिपोर्ट में सिविल सेवा नियम 1966 के तहत कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी, लेकिन—
कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई
दोषियों को दंड नहीं मिला
उल्टा, वही अधिकारी प्रमोशन पाते रहे


2026 का फैसला: सवालों के घेरे में सरकार


6 अप्रैल 2026 को जारी आदेश के अनुसार शंकर ठाकुर को प्रमुख अभियंता का प्रभार सौंप दिया गया।
यह पद राज्य के सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पदों में से एक माना जाता है।
सवाल उठता है:
क्या जांच में घिरे अधिकारी को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना सही है?


मुख्यमंत्री से शिकायत, मचा सियासी बवाल


इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास शिकायत पहुंची है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि—
लंबित जांच के बावजूद नियुक्ति दी गई
निर्माण कार्यों में गड़बड़ी और सरकारी नुकसान के आरोप नजरअंदाज किए गए
नियमों को दरकिनार कर पदोन्नति दी गई


शिकायत में उठीं बड़ी मांगें


प्रमुख अभियंता पद की नियुक्ति तत्काल निरस्त/स्थगित हो
2015 की जांच रिपोर्ट की उच्चस्तरीय जांच हो
वित्तीय नुकसान का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन हो
दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई हो


बड़ा सवाल: सिस्टम फेल या संरक्षण?


यह पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
क्या जांच रिपोर्ट सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हैं?
क्या प्रभावशाली अधिकारियों को संरक्षण मिल रहा है?
क्या जवाबदेही अब सिर्फ कागजों तक सीमित है?


अब नजर मुख्यमंत्री कार्यालय पर


मामले के सामने आने के बाद विभाग और सरकार की कार्यप्रणाली पर बहस तेज हो गई है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय इस शिकायत पर ठोस कार्रवाई करेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

Buland Chhattisgarh

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