कर्ज चुकता, फिर भी कब्जे की कार्रवाई! मृतक ऋणकर्ता के परिवार की प्रताड़ना का मामला सुप्रीम कोर्ट और PMO तक पहुंचा

‘कर्ज मुक्त भारत अभियान’ ने CJI, हाईकोर्ट, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय से की हस्तक्षेप की मांग
बीमा से पूरा ऋण चुकता होने और ‘जीरो बैलेंस’ विवरण जारी होने के बावजूद कब्जे की कार्रवाई का आरोप, अदालत से तथ्य छिपाने और बार-बार नोटिस भेजकर मानसिक प्रताड़ना देने का आरोप
रायपुर | विशेष संवाददाता
राजधानी रायपुर के भनपुरी क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने बैंकिंग प्रणाली, रिकवरी प्रक्रिया और न्यायिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक मृतक ऋणकर्ता का पूरा कर्ज बीमा कंपनी द्वारा चुकाए जाने और वित्तीय संस्था की ओर से ‘जीरो बैलेंस’ (Zero Balance) का विवरण जारी किए जाने के बावजूद उसके परिवार को लगातार नोटिस भेजे जा रहे हैं तथा संपत्ति पर कब्जे की कार्रवाई आगे बढ़ाई जा रही है।मामले को गंभीर जनहित का विषय बताते हुए ‘कर्ज मुक्त भारत अभियान’ (छत्तीसगढ़ टीम) ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI), छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को विस्तृत ज्ञापन भेजकर निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई और पीड़ित परिवार को राहत देने की मांग की है।
किस प्रकार के आरोप लगाए गए हैं शिकायत कर्ता द्वारा?
ज्ञापन के अनुसार, रायपुर के भनपुरी (रामेश्वर नगर) निवासी श्रीमती अमेरिका बाई देशलहरे, जो स्वर्गीय कृपाराम देशलहरे की पत्नी हैं, ने वित्तीय संस्था एवं उसकी रिकवरी प्रणाली पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।शिकायत में कहा गया है कि ऋणकर्ता की मृत्यु के बाद संबंधित बीमा कंपनी ने ऋण की पूरी बकाया राशि वित्तीय संस्था को अदा कर दी थी। इसके बाद संस्था द्वारा ऋण खाते का ‘जीरो बैलेंस’ विवरण भी जारी किया गया। इसके बावजूद परिवार के खिलाफ ऋण वसूली और संपत्ति पर कब्जे की प्रक्रिया जारी रखी गई।पीड़ित परिवार का आरोप है कि न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया तथा SARFAESI अधिनियम के तहत धारा 13(2) के जवाब और अन्य आवश्यक दस्तावेजों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही धारा 14 के तहत दाखिल शपथ पत्र में अधूरी अथवा भ्रामक जानकारी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है।
बार-बार नोटिस से बढ़ी परेशानी!
शिकायत के मुताबिक, 25 मई 2026 को जारी नोटिस के बाद 30 जून और 30 जुलाई 2026 को पुनः नोटिस भेजे गए, जिससे परिवार पर लगातार मानसिक दबाव बनाया गया। इतना ही नहीं, रिकवरी एजेंट द्वारा नकद रूप से ली गई राशि का ऋण खाते में समुचित समायोजन नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।पीड़ित परिवार का कहना है कि ऋण समाप्त हो जाने के बाद भी उन्हें बार-बार कानूनी कार्रवाई और संपत्ति जब्ती की चेतावनियां मिल रही हैं, जिससे वे मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रभावित हुए हैं।
‘कर्ज मुक्त भारत अभियान’ ने उठाई पांच बड़ी मांगें
अभियान के प्रतिनिधि राहुल कुमार मिश्रा और संगीता बर्मन ने अपने ज्ञापन में मांग की है कि—
- पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी अथवा वरिष्ठ अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- यदि जांच में तथ्य छिपाने, जालसाजी या गलत शपथ पत्र देने की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाए।
- जांच पूरी होने तक पीड़ित परिवार के खिलाफ किसी भी प्रकार की कुर्की, वसूली या कब्जे की कार्रवाई तत्काल प्रभाव से रोकी जाए।
- लोन क्लोजर से संबंधित सभी मूल दस्तावेज एवं संपत्ति के कागजात एक सप्ताह के भीतर परिवार को लौटाए जाएं।
- मानसिक एवं आर्थिक प्रताड़ना के लिए उचित मुआवजा दिया जाए तथा भविष्य में किसी भी अवैध वसूली या धमकी से कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
अब सबकी नजर प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं पर
यह मामला अब देश की सर्वोच्च न्यायिक एवं प्रशासनिक संस्थाओं तक पहुंच चुका है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक परिवार का मामला नहीं रहेगा, बल्कि बैंकिंग प्रणाली, रिकवरी एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी बड़े सवाल खड़े करेगा।वहीं यदि जांच में आरोप निराधार साबित होते हैं, तो संबंधित पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
क्या कोर्ट लेगा संज्ञान
«”नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी स्तर पर तथ्य छिपाए गए हैं, तो दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।”
— कर्ज मुक्त भारत अभियान, छत्तीसगढ़ टीम»






