Friendship Day Special: बनारस में मिसाल बन रही इन लोगों की दोस्ती…

( PUBLISHED BY – SEEMA UPADHYAY )
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो कभी कभी खून के रिश्तों से भी गहरा हो जाता है। तुलसीदास ने ‘आपदा काल’ में मित्रता की पहचान की बात कही है। सोशल मीडिया पर आज दोस्त रोज बनते हैं, लेकिन सच्ची दोस्ती निभाना आसान नहीं होता। आज फ्रेंडशिप डे है। कुछ लोगों से बात करके जानिए दोस्ती की अहमियत। कैसे दो लोग एक दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

मां पड़ी बीमार तो दोस्त ने की मदद
उत्तर प्रदेश पुलिस में डीएसपी राजीव द्विवेदी और इंजीनियरिंग कॉलेज के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ राजेश कुमार श्रीवास्तव 1992 में बीएचयू में ग्रेजुएशन के दौरान मिले थे। इंटरेक्ट क्लब में शामिल होने के बाद उनकी दोस्ती परवान चढ़ा। दोनों एनसीसी की एयर विंग में भी शामिल हुए। सी सर्टिफिकेट भी मिला। दोस्ती बढ़ी तो पारिवारिक बंधन ऐसा हो गया कि सुख-दुख में साथ-साथ खड़े रहते हैं। 2001 में राजीव की मां को लकवा मार गया था। राजीव उस समय पुणे में थे। ऐसे में राजेश ने इलाज, जांच से लेकर पूरी सर्विस की।
कोरोना काल की भी फिक्र नहीं की
कंदवा निवासी सन्नी वर्मा और बीएलडब्ल्यू निवासी प्रशांत की ग्यारहवीं कक्षा में दोस्ती थी। 2021 में जब कोरोना अपने चरम पर था, तब प्रशांत की तबीयत बिगड़ गई। सनी ने एक पल के लिए भी जान की परवाह नहीं की। माता-पिता के मना करने के बावजूद वह मदद के लिए दोस्त के घर पहुंचा। कोरोना के चलते अस्पताल के डॉक्टर उसे देखने को तैयार नहीं थे। किसी तरह उसका इलाज शुरू हुआ तो पता चला कि प्रशांत को डेंगू है और उसकी हालत बेहद गंभीर है। लगातार दवा और सेवा के चलते सनी अपने दोस्त को मौत के मुंह से बाहर ले आया। इस बुरे वक्त में दोनों दोस्त दोस्ती का असली मतलब समझ गए।
गर्दिश के दिनों में परवान चढ़ी दोस्ती
नई कॉलोनी काकरमट्टा निवासी ओम प्रकाश श्रीवास्तव और शिवाजी नगर कॉलोनी, महमूरगंज निवासी पन्ना लाल मौर्य नौकरी के दौरान दोस्त बन गए। पिछले साल 11 नवंबर को दोस्ती के 50 साल पूरे भी हुए थे। पन्ना ने बताया कि घर जाते वक्त छुट्टी नहीं मिल रही थी। ऐसे में ओम ने खड़े होकर घर बनाया और आर्थिक मदद भी की। नौकरी के दौरान भी काफी लेन-देन हुआ, लेकिन हिसाब-किताब नहीं रखा गया। घर में शादी के बाद भी दोनों एक दूसरे की मदद के लिए खड़े रहते थे।







