छत्तीसगढ़
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शैक्षणिक भ्रमण या मौन की कीमत?

यह कोई रहस्य नहीं कि सत्ता को सबसे अधिक डर सवालों से लगता है और सवाल करने वालों को साधने का सबसे आसान तरीका है सुविधा। छत्तीसगढ़ में जनसंपर्क विभाग द्वारा पत्रकारों के नाम पर आयोजित किए जा रहे तथाकथित “शैक्षणिक टूर” उसी सुविधा-संस्कृति का विस्तार जान पड़ते हैं। नाम भले ही शैक्षणिक हो, पर इंतज़ाम शाही – हवाई यात्रा, आलीशान होटल, भरपूर खान-पान और अनगिनत सहूलियतें।

सवाल यह नहीं कि पत्रकार क्यों गए; सवाल यह है कि कौन चुना गया, किस आधार पर, और किस पारदर्शिता के साथ?


जब प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में स्कूल शिक्षक के बिना, अस्पताल डॉक्टर के बिना और गांव बुनियादी सुविधाओं के बिना जूझ रहे हों, तब जनता के टैक्स का सबसे ज़रूरी उपयोग क्या यही है? यदि यह सचमुच शैक्षणिक उद्देश्य से है, तो फिर चयन सूची, खर्च का ब्यौरा और भ्रमण की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं? पारदर्शिता से परहेज़ क्यों?
अभी हाल में राजस्थान की यात्राएँ – कभी 20-25 पत्रकार, कभी 30 सदस्यों की टीम, लगातार और नियमित। यात्रा का उद्देश्य अस्पष्ट, पर मौन का विस्तार स्पष्ट। आश्चर्य जानकारी की कमी पर नहीं, चुप्पी की संगति पर है, सब कुछ जानते हुए भी सवाल न पूछने की आदत पर।
यहाँ जिम्मेदारी दो तरफ़ है। जनसंपर्क विभाग- जिसका दायित्व सूचना देना है, वह यदि सूचना को सुविधा से बदल रहा है, तो यह लोकतंत्र के साथ छल है। और पत्रकार- जो यदि सवालों की जगह सुविधाएँ चुनते हैं, तो वे अपने पेशे की आत्मा को गिरवी रखते हैं। पत्रकारिता भ्रमण से नहीं, संघर्ष से सीखी जाती है; रिपोर्ट होटल के लॉबी में नहीं, मैदान में लिखी जाती है।
कविता की तरह नहीं, सच की तरह कहना पड़ेगा—
सवाल बिक जाएँ तो सत्ता बेख़ौफ़ हो जाती है,
कलम थक जाए तो जनता बेआवाज़ हो जाती है


यह समय है कि जनसंपर्क विभाग हर यात्रा का सार्वजनिक हिसाब दे- उद्देश्य, चयन, खर्च और निष्कर्ष। और यह भी समय है कि पत्रकार तय करें- वे सत्ता के मेहमान हैं या जनता की आवाज़।
क्योंकि यह शैक्षणिक टूर नहीं, अगर पारदर्शिता नहीं- तो यह सुविधाजनक चुप्पी का निवेश है।

Buland Chhattisgarh

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